आइडियाज….इन्फ्लुएंसर्स को ब्रांड से कनेक्ट करके आगे बढ़ने वाले दो दोस्तों की कहानी

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एक जमाना था, जब कोई कंपनी अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग के लिए सेल्स टीम हायर करती थी। वह घर-घर, दुकान-दर-दुकान अपने प्रोडक्ट के बारे में बात करती थी। सेल्स टीम जब दर्जनों दुकानों और घरों में जाती, तब सिर्फ दो-चार लोग प्रोडक्ट खरीदने के लिए राजी होते। इतना ही नहीं, कंपनी अपने प्रोडक्ट के प्रचार के लिए सड़कों पर, दीवारों पर बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगवाती थी।

आज सब कुछ बदल चुका है। हर हाथ में मोबाइल है और कंपनियों के लिए डिजिटल ऐडवर्टाइजमेंट ही अपने प्रोडक्ट के बारे में बताने का माध्यम है। हर ब्रांड एक इन्फ्लुएंसर को ढूंढ रहा है, लेकिन उन्हें सही समय पर सही इन्फ्लुएंसर मिल जाए, इस बात की गारंटी नहीं। इसी गारंटी को हम लेते हैं। ब्रांड को इन्फ्लुएंसर से कनेक्ट कराते हैं।’

इन्फ्लुएंसर और ब्रांड को कनेक्ट कराने वाली कंपनी CYBEES के को-फाउंडर अवि भार्गव यह बातें बता रहे हैं। कहते हैं, ‘लोग जिस कंटेंट, रील को मोबाइल में स्क्रॉल कर रहे होते हैं, उन्हें शायद पता ही नहीं है कि इसका कितना बड़ा बिजनेस है। कंपनी को शुरू किए हुए दो साल हुए हैं। इतने कम समय में हम सालाना एक करोड़ का टर्नओवर कर रहे हैं।’

दिल्ली के रहने वाले अवि भार्गव , इन्होंने सोशल इन्फ्लुएंसर्स को ब्रांड से कनेक्ट करने की कंपनी Cybees की शुरुआत 2022 में की थी। अवि के साथ उनकी कंपनी के को-फाउंडर संयम बत्रा भी हैं। टेबल पर दो लैपटॉप रखे हुए हैं। अवि कहते हैं, ‘हमारे पास अभी 10 से ज्यादा लोगों की टीम काम कर रही है। सभी अपने घर से काम करते हैं। डिजिटल मार्केटिंग ऐसा सेक्टर है, जहां किसी सेटअप की जरूरत नहीं।

जब 2022 में हमने कंपनी की शुरुआत की, तब 20 से ज्यादा लोगों की टीम थी। शुरुआत में ज्यादा काम मिल रहे थे, फिर धीरे-धीरे ब्रांड्स ने काम देना कम कर दिया। इस वजह से कॉस्ट कटिंग के लिए 10 से ज्यादा लोगों को हमें हटाना पड़ा।अभी हमने फिर से अलग-अलग ब्रांड्स को अप्रोच करना शुरू किया है। आज हमारे साथ 50 से ज्यादा क्लाइंट्स और 8 हजार से ज्यादा इन्फ्लुएंसर्स जुड़े हुए हैं।’

सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ब्रांड के प्रोडक्ट पहनकर उसे फिल्माते हैं। वीडियो बनाते हैं। इससे कंपनी की मार्केटिंग होती है।अवि और संयम, दोनों दिल्ली से हैं। अवि के पिता एजुकेशन सेक्टर में हैं, जबकि संयम के पिता की कपड़ों की दुकान है। अवि कहते हैं, ‘मम्मी शादी से पहले से एजुकेशन सेक्टर से जुड़ी हुई थीं। फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद उन्होंने एक कॉलेज की फ्रेंचाइजी ले ली थी।

शादी के बाद पापा भी उसी बिजनेस से जुड़ गए, लेकिन अचानक से कुछ साल बाद कुछ विवाद की वजह से एजुकेशन इंस्टीट्यूट को बंद करना पड़ा। बाद में फिर दोनों ने एजुकेशन सेक्टर रिलेटेड बिजनेस को शुरू किया। शहर में जगह की इतनी दिक्कत थी कि जहां उनका ऑफिस था, वहां रात में किसी का कॉल सेंटर चलता था।

बचपन से फैमिली बिजनेस को ही देखते हुए बड़ा हुआ, लेकिन मैं फुटबॉलर बनना चाहता था। बचपन में मुझे दिमागी बीमारी थी। अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर यानी ADHD की प्रॉब्लम था। जैसे-जैसे बड़ा हो रहा था, यह बीमारी बढ़ती ही जा रही थी। मैं एग्रेसिव नेचर का था। हर दूसरे-तीसरे दिन स्कूल वाले पापा को बुला लेते थे।

आप कह सकते हैं कि मैं फिजिकली चैलेंज्ड था। मेरा दिमाग एक जगह पर नहीं टिक पाता है। डॉक्टर ने स्पोर्ट्स की सलाह दी। कुछ महीनों तक साइकेट्रिस्ट के पास भी काउंसलिंग के लिए जाना पड़ा। पापा को हर दूसरे-तीसरे दिन डॉक्टर के पास जाना पड़ता था। तब फाइनेंशियल कंडीशन भी उतनी अच्छी नहीं थी।

जब मैं 7वीं-8वीं में था, तब तक फुटबॉल खेलता था। रात को खाते वक्त घर में बिजनेस की ही बातें होती थीं। इस वजह से न चाहते हुए भी मेरे दिमाग में बिजनेस ही चलता रहता था। 10वीं के बाद मैंने डिसाइड कर लिया कि अब मुझे भी बिजनेस ही करना है।’

संयम अपने परिवार के बारे में बताते हैं। कहते हैं, ‘मैं तो मूल रूप से उत्तर प्रदेश से हूं। काम की तलाश में दादा दिल्ली आए थे। चांदनी चौक के पास उन्होंने एक दुकान खोली थी। फिर पापा ने उसे संभालना शुरू किया। आज हमारा जैकेट बनाने का फैमिली बिजनेस है।2020 की बात है। मेरा BBA चल रहा था और अवि का B.Com।’

अवि और संयम बातचीत के साथ-साथ कुछ इन्फ्लुएंसर की लिस्ट बना रहे हैं। कहते हैं, ‘2020 में कोरोना की वजह से सब कुछ बंद था। हम बिजनेस को लेकर प्लान कर रहे थे। स्टडी के बाद पता चला कि इंडिया में करोड़ों इन्फ्लुएंसर हैं, जो कंटेंट तो क्रिएट करते हैं, लेकिन वे इससे पैसा नहीं कमाते हैं।

वही हाल ब्रांड्स का है। आज की तारीख में हर एक नए ब्रांड को मार्केटिंग के लिए इन्फ्लुएंसर की जरूरत है। जब हमने कुछ ब्रांड्स से बात की, तो उनका कहना था कि उन्हें मन मुताबिक कंटेंट क्रिएटर्स नहीं मिलते हैं। जबकि इन्फ्लुएंसर को भी काम नहीं मिलता है।’

अवि अपने दोस्त संयम के साथ हैं। दोनों स्कूल फ्रेंड हैं। जब अवि के साथ किसी ने भी बिजनेस शुरू करने से मना कर दिया, तो संयम ने साथ दिया।अवि बताते हैं, ‘हमारे पास तो पैसे भी नहीं थे। मैंने करीब एक साल तक इंटीरियर डिजाइनिंग का काम किया। इससे करीब 10 लाख की सेविंग कर ली। संयम फाइनेंशियली स्ट्रॉन्ग फैमिली से आता है। हम दोनों ने मिलकर 40 लाख का इन्वेस्ट किया था। दरअसल टेक्नोलॉजी डेवलप करने में ही सबसे ज्यादा पैसे लग गए।

जब मैं अपना बिजनेस पार्टनर ढूंढ रहा था, तो कोई भी साथ आने को राजी नहीं हुआ। संयम के साथ जब आइडिया शेयर किया, तो वह झट से राजी हो गया। जब पैसे की बात आई, तो घरवालों से लेकर, रिश्तेदार सब ने मना कर दिया। शायद उन्हें यकीन नहीं था कि हम कुछ कर भी पाएंगे। घरवालों के पास पैसे भी नहीं थे।’

क्लाइंट मिलने में दिक्कत तो नहीं हुई?
अवि कहते हैं, ‘टेक्नोलॉजी डेवलप करने के बाद जब हमने क्लाइंट को ढूंढना शुरू किया, तो कोई बात भी नहीं करना चाहता था। बड़ी मशक्कत के बाद एक कंपनी के साथ डील हुई।कई बार ऐसा भी हुआ जब बिजनेस डाउन होने के बाद हमें कोई मेल या कॉल पर रिप्लाई नहीं देता था, तो हम दोनों गुरुग्राम बेस्ड कंपनियों के ऑफिस में डायरेक्ट चले जाते थे। कई घंटों के इंतजार के बाद कोई क्लाइंट अपना टाइम देता था। इसी दौरान मेरी एक बड़ी कंपनी के साथ डील हो गई।

ऐसे करके हम यहां तक पहुंचे हैं। हमारा टारगेट है कि सभी इन्फ्लुएंसर को उनकी क्षमता के मुताबिक काम मिले और ब्रांड को भी परफेक्ट कंटेंट क्रिएटर्स मिलें, क्योंकि उनके बिजनेस का ग्रोथ इसी पर टिका हुआ है। हम अभी एक ऐसी टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं, जिसमें कोई भी क्लाइंट अपने मनपसंद इन्फ्लुएंसर से हमारे प्लेटफॉर्म के जरिए कनेक्ट हो सकता है।’

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