दृढ़ इच्छा शक्ति और मेहनत के दम पर अपनी किस्मत खुद लिखी जा सकती है…बचपन में बीमारी ने छीन लिए थे हाथ-पैर, आज नामी पैरा-एथलीट हैं

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आपके आस-पास कई सारे ऐसे लोग होंगे, जो अक्सर किस्मत को कोसते होंगे. जबकि, सच तो यह है कि दृढ़ इच्छा शक्ति और मेहनत के दम पर अपनी किस्मत खुद लिखी जा सकती है. फ्रांस के पैरा स्विमर थियो करिन इसके एक बड़े उदाहरण हैं. थियो जन्म से ही दिव्यांग नहीं थे. वो 5-6 साल के थे, जब मेनिंगगोकोकल मेनिनजाइटिस नाम की एक बीमारी से वो ग्रसित हो गए थे. इस बीमारी में शरीर में ब्लड क्लॉटिंग की समस्या हो जाती है.

यह कितनी गंभीर बीमारी है इसको इसी से समझा जा सकता है कि डॉक्टरों को थियो को बचाने के लिए उनके हाथ और पैर काटने पड़े थे. इस इलाज से थियो की जान तो बच गई थी. मगर वो हमेशा के लिए दिव्यांग हो गए. थियो के लिए इसे स्वीकारना बेहद कठिन था. मगर उन्होंने इस सच्चाई को स्वीकार किया और सकारात्मक सोच के साथ जीवन में आगे बढ़े. जिंदगी के सफ़र में उनकी मुलाकात फिलिप क्रोइजोन से हुई.

फिलिप उनकी ही तरह दिव्यांग थे. मगर अपनी इच्छाशक्ति के दम पर खुद को एक पैरा-एथलीट के रूप में स्थापित कर चुके थे. फिलिप की सलाह पर थियो ने स्विमिंग शुरू की. शुरुआत में उन्हें कई तरह की कठिनाईयां आईं. मगर धीरे-धीरे वो सफल होते गए. 50 मीटर से शुरू की गई उनकी स्विमिंग अब 100 किलोमीटर से अधिक तक पहुंच गई है. मौजूदा समय में वो 8 डिग्री ठंडे पानी में 122 किलोमीटर स्विमिंग करने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं.

अभी तक जिस तरह से थियो ने हर एक परीक्षा को पास किया है. उम्मीद है वो इस पड़ाव को पार करने में भी सफल रहेंगे. भविष्य के लिए उन्हें शुभकामनाएं.

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