पेड़ों के संरक्षण को लेकर अनोखी मुहिम…ये महिलाएं लकड़ी माफियाओं से जंगल बचाने के लिए धनुष-बाण और डंडे लेकर जाती हैं

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पेड़ों के संरक्षण को लेकर एक महिला की पहल ने संस्था का रूप लिया और इसी की वजह से आज समाज में यह संस्था बड़ा बदलाव लेकर आई है. इस बहादुर महिला का नाम जमुना टुडू है. 1998 में झारखंड के जमशेदपुर में एक ठेकेदार से जमुना टुडू को शादी हुई. उन्हें सूखी लकड़ियों और सूखे पत्ते लेने के लिए कई मील का सफ़र तय करना पड़ता था. उन्हें यह सफ़र बेफ़िज़ूल लगता था. इस दौरान जमुना को हमेशा अपने माता-पिता द्वारा पेड़-पौधे लगाने की याद आती थी, वो घटते जंगलों के लिए चिंतित रहते थे.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़, जमुना को प्रेरणा मिल चुकी थी. उन्होंने अपने जैसी कुछ महिलाओं को जमा किया और पेड़ों की रक्षा का ज़िम्मा उठा लिया. शुरुआत में उनके साथ सिर्फ चार महिलायें ही आगे आयीं. ये महिलाएं मिलकर जंगल में गश्त लगाती थी और पेड़ काटने की स्थिति में अलार्म बजाती थीं. धीरे-धीरे इस मुहीम में और महिलाएं भी जुड़ गईं और इस तरह “महिला वन रक्षण समिति’ की स्थापना हुई.

ये महिलाएं लकड़ी माफियाओं से 50 हेक्टेयर जंगल बचाने के लिए धनुष-बाण और डंडे लेकर जाती हैं. 37 वर्षीय जमुना को ‘लेडी टार्ज़न’ के नाम से जाना जाता है. वर्तमान में जमुना के पास 300 से ज्यादा ऐसे ग्रुप है, जो माफिया से वनभूमि को बचाने के लिए काम करते हैं. वे तीन शिफ्टों में काम करते हैं – सुबह, दोपहर और शाम.

जमुना ने कहा, “मुझे कई बार धमकी दी गई और हमला किया गया, 2011 में घाटशिला के पास कोपरा में इस दंपति पर सबसे खतरनाक हमला किया गया था जब वह पेड़ों को काटने के खिलाफ लोगों को समझाने की कोशिश कर रहा था. 2008 में, लकड़ी माफिया के इशारे पर उसके घर में तोड़फोड़ की गई थी. उनके लिए, पेड़ भाई हैं. वह और अन्य ग्रामीण हर साल रक्षा बंधन पर उन पर ‘राखी’ बांधते हैं.”

क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक (Chaibasa) विश्वनाथ शाह कहते हैं, “लोगों के बीच उनकी पहुंच काफ़ी सराहनीय है और उन्होंने वन की संख्या बढ़ाने में बहुत योगदान दिया है.” जमुना को अपने काम के लिए 2016 में राष्ट्रपति पुरस्कार दिया गया था, और 2019 में, उन्हें पद्म श्री के लिए चुना गया था. जबकि 2017 में, NITI Aayog ने जमुना को उन 12 महिलाओं में से एक के रूप में मान्यता दी है जो भारत को बदल रही हैं.

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