कृषि विशेष…कृषि सुधार विधेयकों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ेगी आईफा

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*कृषि विधेयकों की विसंगतियों पर सुप्रीम कोर्ट इसी सोमवार को करेगी सुनवाई
*विधि विशेषज्ञों की राय : केंद्र सरकार को इन विधेयकों के लाने का नहीं था अधिकार
*मनोहर लाल शर्मा के द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर की है याचिका, आईफा करेंगी समर्थन

कृषि सुधार के नाम पर केंद्र सरकार ने जो तीन बिल पास किये हैं, इसे लेकर किसानों में भारी आक्रोश है. अखिल भारतीय किसान महासंघ (आइफा) के राष्ट्रीय संयोजक डॉ राजाराम त्रिपाठी ने कहा कि सरकारें किसानों के अधिकारों की सुरक्षा की सिर्फ बातें करती है लेकिन जब संवैधानिक जामा पहनाना होता है तो वह किसानों के बजाय कारपोरेट के पक्ष खड़ी ज्यादा दिखती हैं. सरकार इन बिलों के जरूरी संशोधन के प्रति तनिक भी रुचि नहीं दिखा रही है.

डॉ त्रिपाठी ने कहा कि आठ और नौ अक्टूबर को पद्म पुरस्कार से सम्मानित तथा देश के कुछ प्रतिष्ठित प्रगतिशील किसानों तथा केंद्रीय कृषि मंत्री के साथ इस बिल पर चर्चा के लिए बैठक रखी गई थी लेकिन अंतिम समय में एजेंडे में संशोधन से संबंधित मुद्दों को ही हटा दिया गया. उन्होंने कहा कि इन बैठकों में आईफा की ओर से भाग लेने के लिए वे दिल्ली गये थे लेकिन जब एजेंडे में संशोधन वाले मुद्दे को हटा दिया गया तो आईफा ने इस बैठक का बहिष्कार कर दिया.

डॉ. त्रिपाठी ने बताया कि अब किसानों के पास सरकार द्वारा थोपी जा रही परतंत्रा के खिलाफ किसानों को कानून का ही सहारा है और अब आईफा इसके खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ेगी. इन तीनों बिल्स के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता मनोहर लाल शर्मा ने एक याचिका भी दायर की है. इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 11 अक्टूबर को सुनवाई करेगा. आइफा ने इस लड़ाई में मनोहर लाल शर्मा को पूरा समर्थन देने का वादा किया है.

इस कानूनी लड़ाई को और कैसे धार दी जा सकती है, इस मुद्दे पर अगले सप्ताह आईफा अपने सहयोगी संगठनों के साथ विचार-विमर्श कर आगे की रणनीति तैयार करेगी.केंद्र सरकार के जो तीनों बिल द फार्मर्स (एंपावरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस अश्योरेंस, द फॉर्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) और द एसेंशियल कमोडिटीज (अमेंडमेंट) पास की है वह सभी बिल्स किसानों के अधिकारों के खिलाफ हैं. डॉ त्रिपाठी ने कहा कि अधिवक्ता शर्मा ने अपनी याचिका में जो प्रमुख सवाल उठाए हैं उसमें एक तो यह कि राज्य से संबंधित मामलों में संसद के पास कोई कानून बनाने का संवैधानिक अधिकार नहीं है. दूसरा, क्या किसी शब्द के प्राकृतिक अर्थ को कानून द्वारा मनगढ़ंत शब्द से बदला जा सकता है?, तीसरा सवाल यह कि क्या किसान की आजादी कॉरपोरेट घरानों के पक्ष में खरीदी जा सकती है और चौथा सवाल यह है कि जिस नोटिफिकेशन पर बहस हो रही है, क्या वह फ्रीडम, लाइफ और लिबर्टी की संवैधानिक गारंटी के विपरीत “ईस्ट इंडिया कंपनी सिस्टम्स” की वापसी नहीं है? इन सबका आईफा ने समर्थन किया है.

डॉ त्रिपाठी ने कहा कि अगर इन बिल्स में संशोधन नहीं किया गया तो आगे चलकर किसानी और खेती कॉर्पोरेट के नियंत्रण में आ जाएगी. किसानों से प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दबावों ओं के तहत अंगूठे लगवाये या हस्ताक्षर कराए जाएंगे और दबाव में उनकी जगह, फसल और आजादी को कॉर्पोरेट हाउस के नियंत्रण में ला दिया जाएगा. उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार के किसानों से संबंधित तीनों बिल्स को लेकर उत्तर भारत में जबरदस्त आंदोलन चल रहा है.

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